Login to your account

Username *
Password *
Remember Me

Create an account

Fields marked with an asterisk (*) are required.
Name *
Username *
Password *
Verify password *
Email *
Verify email *
Captcha *
Reload Captcha

पट्टाधारकों को मालिक बनाएगी यूपी सरकार

 

व्यक्ति की यह ख्वाहिश होती है कि उसके पास कोई ऐसी सम्पत्ति जरूर हो जिसे वह अपना कह सके। उसका अपना घर हो, अपने खेत हों, अपनी नौकरी हो या अपना कोई व्यापार-धंधा। हम उन
साधु-सन्यासियों की बात नहीं करते जो माया-मोह और संसार से विरक्त हो चुके हैं। उनके लिए परमशक्ति ही सब कुछ है। अध्यात्म का यह सिद्धांत सभी पर लागू भी नहीं किया जा सकता।
इस पृथ्वी पर रहने वाले अधिकतर सांसारिक जीव हैं। पशु-पक्षी भी अपना ठिकाना बनाना जरूरी समझते हैं, इसलिए सृष्टि के सबसे बुद्धिमान माने जाने वाले इंसान के लिए यह सोचना और प्रयास करना तो स्वाभाविक है। अभी गत तीन जुलाई को नरेन्द्र मोदी की सरकार ने सामाजिक आर्थिक और जातीय जनगणना के प्रमुख बिन्दुओं को जारी किया है। इस रिपोर्ट में जातिगत आंकड़े नहीं बताये गये लेकिन सामाजिक-आर्थिक स्थिति का ब्योरा जरूर दिया गया। उसको देखकर लगता है कि अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की सरकार ने एक अच्छा निर्णय लिया है कि लाखों पट्टाधारकों को उस जमीन का मालिक बना दिया जाएगा जिन पर वे अभी रह रहे हैं या खेती करते हैं। कत्र्तव्य की यहीं पर इतिश्री नहीं हो जाती बल्कि जंगलों में रहने वालों, भीख मांगने वालों और खाना बदोशी की जिंदगी गुजारने वालों के लिए भी कुछ ऐसी व्यवस्था करनी होगी जिससे उनको यह महसूस हो सके कि उनके पास उनका अपना भी कुछ है।
अखिलेश यादव की सरकार ने विधानमंडल के अगले सत्र जो इसी महीने अर्थात जुलाई से शुरू होगा। इस सत्र मंे राजस्व संहिता बिल 2015 लाने की तैयारी है। मानसून सत्र में कई महत्वपूर्ण कार्य करने का विचार अखिलेश यादव की सरकार कर रही है। इसी के तहत गत तीन जुलाई को मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय बैठक बुलाई गयी थी। इस बैठक में प्रस्तावित संशोधनों पर विचार-विमर्श किया गया। उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनाव की तैयारी भी जोर शोर से चल रही हैं। विपक्ष की तरफ से बसपा, कांग्रेस और भाजपा भी अपने-अपने स्तर से चुनाव की तैयारी कर रही हैं। भाजपा ने तो सांगठनिक क्षमता को दुरूस्त करने का प्रयास ज्यादा तेज कर दिया है, जिसके तहत प्रभारी नियुक्त किये जा रहे हैं। सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के लिये सांगठनिक क्षमता बढ़ाने के साथ सरकार की प्रगति भी जनता के सामने पेश करनी है। सपा नेता और कार्यकर्ता गांव-गांव इसके लिये चैपाल लगा रहे हैं और प्रदेश सरकार की उपलब्धियां गिना रहे हैं इसलिए सरकार ऐसा चाहती है कि कुछ महत्वपूर्ण कार्य उसकी पहचान बन जाएं। इसी संदर्भ में यह विचार किया जा रहा है कि प्रदेश के उन लोगों को जमीन का मालिक बना दिया जाए जिनके नाम ग्राम पंचायत या नगर पालिका-नगर निगम की जमीन पट्टा की गयी है। मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई बैठक में दो प्रमुख मुद्दों पर सहमति बनी। इनमें पहला मुद्दा था कि बड़ी विकास परियोजनाओं के लिये जमीन लेने में राज्य सरकारों के
अधिकारों में बढ़ोत्तरी की जाए और दूसरा कार्य यह कि आसामी पट्टे धारकों को मालिकाना हक दे दिया जाए।
मंत्रिमण्डलीय बैठक में कहा गया कि आसामी पट्टा धारकों को असंक्रमणीय भूमिधर अधिकार दे दिया जाए। प्रदेश में आसामी पट्टाधारकों की संख्या लाखों मंे है और लगभग 50 साल से ये पट्टाधारक अपना-अपना खेत जोत-बो रहे हैं। इसके बाद भी वे पट्टा धारक उस जमीन के मालिक नहीं हैं। इसलिए उस जमीन के
आधार पर उनको बैंक से कर्ज नहीं मिल सकता। अगर उनको मालिकाना हक मिल जाएगा तो वे अपने उस खेत पर अधिक से अधिक फसल उगाने के लिये बैंक से ऋण भी ले सकेंगे। सरकार यह भी सुनिश्चित करना चाहती है कि पट्टाधारक जमीन का मालिक बनने के बाद 10 साल तक उस जमीन को बेच नहीं सकेंगे। इस तरह की आशंका निर्मूल नहीं है क्योंकि गांवों में तो विशेष रूप से दबंगों का यही रवैया रहता है कि सरकार की तरफ से पट्टा भले दे दिया जाए लेकिन जमीन पर कब्जा दबंगों का ही रहता है। भूमिहीन लोग मेहनत-मजदूरी करने तक ही सीमित रह जाते हैं। इस
तरह सरकार का उद्देश्य पूरा नहीं हो पाता है।
केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री
चैधरी वीरेन्द्र सिंह ने गत तीन जुलाई को आर्थिक, सामाजिक और जातीय जनगणना का जो ब्यौरा दिया है, उसके अनुसार देश की हालत अब भी दयनीय है। इसके चलते आवास, शिक्षा, कौशल विकास, मनरेगा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम आदि का लाभ भी नहीं मिल पाता है। रिपोर्ट के अनुसार 17.91 गांवों में रहने वाले परिवार हैं। इनमें 2.37 करोड़ परिवार ऐसे हैं जो एक कमरे के कच्चे मकान में रहकर गुजर-बसर कर रहे हैं। गांवों में रहने वाले 17.91 करोड़ परिवारों में सिर्फ 6.39 करोड़ परिवार ही खेती के सहारे हैं। इसका मतलब यह कि 10 करोड़ से ऊपर परिवार ऐसे हैं जिनके पास खेती नहीं है। अब यदि मान लिया जाए कि इसमें आधे अर्थात पांच करोड़ परिवार छोटा-मोटा व्यवसाय, पशुपालन आदि करते हैं, तब भी पांच करोड़ परिवार ऐसे हैं जो गांवों में सिर्फ मजदूरी करके ही अपना और अपने परिवार का पालन करते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि 44.48 लाख परिवार दूसरों के घरों में या खेतों में काम करते हैं। चार लाख परिवार तो कचरा बीनकर गुजारा कर रहे हैं और 6.68 लाख परिवार भीख मांगकर गुजारा कर रहे हैं।


0
0
0
s2smodern
  1. Popular
  2. Trending