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सलाह नहीं कठोर कार्रवाई की जरूरत

 

 

 

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की अपने पार्टी कार्यकर्ताओं और पुलिस को दी गयी सलाह स्वागत योग्य है। उन्हांेने यह सलाह अलग-अलग आयोजित समारोहों में दी। पहला समारोह कार्यकर्ताओं से संबंधित था। यहां अखिलेश यादव ने उनसे थानों की राजनीति से बाहर निकलने को कहा। दूसरा समारोह पुलिस से संबंधित था। मुख्यमंत्री अपने आवास से पुलिस के 1056 वाहनों की श्रंखला को रवाना करने के अवसर पर बोल रहे थे। यहां उन्हांेने कहा कि अपराधियों में पुलिस का खौफ होना चाहिए। जिससे वह प्रदेश छोड़कर भाग जायें।
यहां दो बातें महत्वपूर्ण हैं एक यह कि अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं, दूसरे गृहमंत्रालय उनके अधीन हैं। इन जिम्मेदारियों के कारण वह पार्टी कार्यकर्ताओं और पुलिस दोनों को रास्ते पर लाने के हकदार हैं। दूसरे शब्दों में यह अखिलेश यादव की जिम्मेदारी भी है। इसमें संदेह नहीं कि अखिलेश ने दोनों ही अवसरों पर बेबाक टिप्पणी की। कार्यकर्ताओं और पुलिस पर उनका यह तीन वर्ष में सबसे तल्ख बयान था।
प्रश्न यह है कि उन्हें इतना तीखा बयान क्यों देना पड़ा। पार्टी और सरकार के मुखिया के रूप में उनकी चिंता को समझा जा सकता है। इन बयानों से साफ है कि वह कार्यकर्ताओं व पुलिस के वर्तमान चाल-चलन से संतुष्ट नहीं हैं। ऐसा भी नहीं कि वह इन दोनों की सच्चाई जानते नहीं हैं ये बात अलग है कि पहली बार उन्हांेने इतने बेबाक ढंग से सच्चाई बयान की। इससे इतना तो जाहिर हुआ कि कार्यकर्ता थानों की राजनीति में व्यस्त हैं। दूसरी तरफ पुलिस का खौफ नहीं है। इसलिए अपराधी प्रदेश छोड़कर भाग नहीं रहे हैं, अर्थात् पुलिस का खौफ ना होने से उनके हौसले बुलन्द हैं। ऐसा भी नहीं कि यह स्थिति एकदम से निर्मित हो गयी। यह सब तीन वर्षों से चल रहा है। कई बार हल्के शब्दों में अखिलेश यादव भी
सुधार की बात कर चुके हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह तो कार्यकर्ताओं को सुधरने की अनेक बार चेतावनी दे चुके हैं।
प्रश्न यह कि मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव को बार-बार इस प्रकार की बातें क्यों करनी पड़ती हैं। क्यों इनकी सलाह या चेतावनी के बाद अपेक्षित सुधार दिखाई नहीं देता। दूसरा प्रश्न यह कि कई बार की सलाह के बाद सुधार नहीं हो रहा है, तो अपेक्षित कदम उठाने में बाधा क्या है। जो कार्यकर्ता थानों की राजनीति करने से बाज नहीं आ रहे हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई कौन करेगा।
या जिन पुलिस वालों को अपराधियों में कोई खौफ नहीं है, उनका चेहरा कौन बदलेगा। प्रदेश की सत्ता और पार्टी दोनों जब अखिलेश के पास हैं, तो कदम भी उन्हीें को उठाने होंगे। यह कार्य कोई बाहरी व्यक्ति नहीं कर सकता। इस बात पर भी गम्भीरता से विचार करना होगा कि जो कार्यकर्ता व पुलिस वाले तीन वर्ष से एक ही ढर्रे पर चल रहे हैं वह शेष डेढ़-दो वर्ष में अपने में बदलाव क्यों करना चाहेंगे। वह कार्यकर्ता थानों की राजनीति आसानी से क्यों छोड़ देंगे।
इसके बल पर उनका इलाके में जलवा कायम होता है। कलफ लगा चमकदार कुर्ता पैजामा, पार्टी का झण्डा लगा लग्जरी वाहन और थाने तक अच्छी पहुंच, यही तो उनकी पहचान है। थाने की राजनीति छोड़ दें, तो इनके राजनीतिक जीवन में बचेगा क्या। सारा आकर्षक ही समाप्त हो जायेगा। ऐसे में इन्हें थाने की राजनीति से हटाना आसान नहीं होगा।
जब राष्ट्रीय अध्यक्ष की सलाह का असर दिखाई नहीं दिया, तो स्थिति की गम्भीरता का अनुमान लगाया जा सकता है। खुद अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री बनने के तत्काल बाद कहा था कि जिम्मेदारी पदाधिकारियों के अलावा कोई भी कार्यकर्ता अपने वाहनों पर पार्टी का झण्डा नहीं लगायेगा।


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