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लखनऊ. यूपी में योगी सरकार बनने के बाद भले ही विकास करने के कितने भी दावे किए जा रहे हों, लेकिन सच ये है कि आज भी यूपी के 8 गांव ऐसे हैं जहां डेवलपमेंट की कोई बात नहीं होती है

लखनऊ. यूपी में योगी सरकार बनने के बाद भले ही विकास करने के कितने भी दावे किए जा रहे हों, लेकिन सच ये है कि आज भी यूपी के कुछ गांव ऐसे हैं जहां डेवलपमेंट की कोई बात नहीं होती है।

ये राज्य के वो गांव हैं, जिसमें कहीं लोग भीख मांगकर अपना जीवन गुजार रहे हैं, तो कहीं आज तक लाइट की फैसिलिटी नहीं पहुंची है। आज आपको 8 गांवों के बारे में बताने जा रहा है, जहां के लिए बड़े-बड़े वादे तो किए गए लेकिन हकीकत के पर्दे पर वादों की पोल खुल गई।
केस 1# झांसी- भीख मांगकर गुजारा करते हैं गांव के लोग
झांसी से करीब 65 किमी दूर मऊरानीपुर कस्बा है। यहां से 10 किमी और आगे बड़ागांव में मजरा जगनपुरा गांव है। बड़ागांव की आबादी करीब 4 हजार है। गांव छोटे-छोटे मजरों में बंटा है, जिसमें से जगनपुरा भी एक है। यहां 20 से ज्यादा किसान परिवार हैं, जो भीख मांगकर दो वक्त की रोटी मुश्किल से जुटा रहे हैं।
लोग क्यों मांग रहे हैं भीख?
- दरअसल, गरीबी और सरकारी योजना की मार यहां 2002 से शुरू हुई। बड़ागांव में सिजार डैम बनाने की योजना 2002 में बनी। इस डैम को बनाए जाने के लिए 1500 बीघा जमीन अधिग्रहित की गई।
- बड़ागांव, रौनी, सिंगरवारा, चुरारा, पंचमपुरा, हरपुरा सहित 6 गांवों के 200 से ज्यादा किसानों का जीवन प्रभावित हुआ। इनमें 95 पूरी तरह से भूमिहीन हो गए। ये सभी छोटे किसान थे, जिनके पास सिर्फ 2 से 3 बीघा जमीन थी। दो बीघा असिंचित भूमि के 36 और सिंचित भूमि वाले किसानों को 48 हजार रुपए मिलना तय था।
- स्थानीय किसान नेता शिवनारायण सिंह बताते हैं कि तीन किश्तों में मुआवजा दिए जाने की बात कही गई। कई किसानों को पहली किश्त कुछ हजार रुपए के रूप में मिली, लेकिन इसके बाद कुछ नहीं मिला।
- अफसरों ने कहा कि किसान एक साथ ज्यादा पैसा देख लेंगे तो उन्हें हार्ट अटैक आ जाएगा। हैरत की बात ये है कि काफी समय पहले डैम का काम पूरा भी हो गया, लेकिन डैम में अब तक पानी ही नहीं आया।
क्या कहना है किसानों का?
- गांव के रहने वाले मूलचंद की उम्र 70 साल है। गरीबी का आलम ये है कि कभी खेती-किसानी करने वाले मूलचंद को अब पास के कस्बे में जाकर भीख मांगनी पड़ रही है।
- कंपकंपाते हुए मूलचंद बताते हैं, ''भीख मांगने के लिए पत्नी भी अक्सर साथ जाती हैं। मेरी कुछ जमीन थी, जो सिजार डैम में चली गई। पहले इसी से गुजर बसर होता था, लेकिन अब मेरे पास कुछ नहीं है।''
- ''मैं सुबह ही निकल जाता हूं। दिन भर बाजार में और घरों में भीख मांगता हूं। कभी 20 तो कभी 50 रुपए मिल जाते हैं। दिन भर में एक-दो किलो आटा भी हो जाता है। कभी सब्जी खरीद कर नहीं खाते। चटनी से ही रोटी खाते हैं।''
- ''वृद्धावस्था पेंशन, राशन कार्ड का लाभ नहीं मिला। मेरे छोटे से खपरैल के घर के बाहर एक योजना के तहत शौचालय जरूर बना दिया गया।''
- वहीं, किसान की पत्नी विद्या देवी कहती हैं, ''सरकार खाने को नहीं देती है, लेकिन शौचालय बना देती है।''
- इसी तरह गेंदाबाई और उसके पति श्याम लाल का पट्टा था, लेकिन भूमि अधिग्रहण में उनकी जमीन चली गई। उन्हें भी वाजिब मुआवजा नहीं मिला। अब दोनों भीख मांगकर खाते हैं। ऐसे ही एक और किसान गुमटा-राजने की 10 बीघा जमीन बांध के इलाके में चली गई। मुआवजा भी नहीं मिला। घर में 4 बेटियां, दो बेटे हैं। उनका पेट भरने के लिए दोनों भीख मांगते हैं।
क्या कहते हैं जिम्मेदार?
- एसडीएम मऊरानीपुर सुनील कुमार शुक्ला ने कहा, ''मामला मेरे संज्ञान में नहीं है। इस मामले की जांच करूंगा। अगर कोई भी परिवार ऐसा मिलता है तो उनकी पुनर्वास प्रोग्राम योजना के तहत मदद की जाएगी। साथ ही जो भी जरूरी सरकारी संसाधन होंगे, उन्हें उपलब्ध कराया जाएगा।''


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