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कड़े कानून के बगैर नहीं रूकेगी प्राईवेट विद्यालयों की लूट

-प्रबन्धकों से वसूलकर अध्यापकों को वेतन दे सरकार।

 सद्दीक खान </p> <p><span style="font-size: 14pt;"> रायबरेली बछरावां । प्रदेश की मौजूदा योगी सरकार शिक्षा व्यापारियों पर कितना भी नकेल कसने के दावे करे परन्तु इनकी रग-रग में बस चुका लूट का रक्त शायद साफ होनें वाला नहीं है। केन्द्र का नेतृत्व कर रहे प्रधानमंत्री नरेन्द्रमोदी व मुख्यमंत्री आदित्य नाथ योगी का प्रयास है कि शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाया और अभिभावकों पर अतिरिक्त बोझ न पड़ने पर पाये इसके लिए उनके द्वारा स्कूलों से पाठ्य पुस्तके टाई बेल्ट, आदि देनें पर रोक लगाई गयी है परन्तु तू डाल-डाल में पात-पात  की कहावत चरितार्थ करते हुए स्कूल प्रबन्धकों के द्वारा अपनी-अपनी व्यक्तिगत दुकानों की व्यवस्था कर दी गयी। और दलील यह दी गई और अभिभावक को ज्यादा भटकना न पड़े प्रति वर्ष फीस बढानें व मेंन्टीनेन्स के नाम पर वसूली के बारें में इन प्रबन्धकों का कहना है कि विद्यालय में आने वाले खर्च की प्रतिपूर्ति के लिए वह ऐसा करते है। इस सन्दर्भ में वह यह भी दलील देते है कि कोर्ट के द्वारा फीस का 15 प्रतिशत मेंन्टीनेन्स  लेनें के लिए उन्हें अधिकृत किया गया है। इस सन्दर्भ में शिक्षक पेशे से जुडे रामकुमार द्विवेदी का कहना है कि प्राईवेट क्षेत्र के विद्यालयों को शिक्षा मंदिर कहना सरस्वती का अपमान है। यह विशुद्ध रूप से शिक्षा की दुकानें है जो लाभ के लिए खोली गयी है । श्री द्विवेदी का कहना है यदि सरकार इनकी लूट पर अंकुश लगाने के लिए गम्भीर तो उसे चाहिए कि इन विद्यालयों के द्वारा लेने वाले शुल्क व अन्य वसूली का व्यौरा अपने समक्ष प्रस्तुत करनें का आदेश करे तथा अध्यापकों व इतर शैक्षिक कर्मचारियों को देने वाले वेतन की सूची सरकार को उपलब्ध कराये तथा उतनी राशि शिक्षा विभाग के खाते में जमा करें और सरकार इन प्राईवेट स्कूलों के अध्यापकों का वेतन अपने द्वारा प्रदान करें। उन्होंनें कहा कि यह विद्यालय 600 रूपये से लेकर अधिकतम 3000 तक वेतन देते है। और उनसे सादे रजिस्टरों में कराकर मनमाना धन भर लेते है। शहरी क्षेत्र में अध्यापकों को कुछ ज्यादा वेतन मिलता है परन्तु वह भी सरकारी मानक से बहुत पीछे होता है। शिक्षक पेशे से ही जुडे़ सेवानिवृत्त अध्यापक रघुराज सिंह नें कहा कि इन विद्यालयों के प्रबन्धकों का आलम यह है कि जब पिछली सरकार द्वारा प्राईवेट स्कूल के अध्यापकों को मानदेय देनें का ऐलान किया गया। तो अधिकांश स्कूल प्रबन्धकों नें केवल नाम भेजने के लिए दस-दस हजार रूपये वसूल लिये जहां इन प्रबन्धकों की मानसिकता इतनी घृणित हो गयी हो वहां बगैर इनकों शिकंजे में डाले शैक्षिक भ्रष्टाचार समाप्त होनें वाला नहीं है। उन्होंनें योगी सरकार से यह भी मांग किया है कि प्राईवेट स्कूलों में भी सरकार के द्वारा छपाई गयी पाठ्य पुस्तके अनिवार्य की जाये यदि कोई विद्यालय प्राईवेट प्रकाशक की पुस्तके चलानें का प्रयास करता है तो उसकी मान्यता रद्द कर दी जाये।


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