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प्रदेश सरकार दे ध्यान! जिले स्तर पर कम्बल और अलाव की दुव्र्यवस्था पर डाले नजर

-प्रशासन ने अलाव और कंबल की गर्माहट देने का किया दावा, हकीकत में सुविधा चंद लोगों तक
 
रायबरेली। डा. राजीव सिंह संयोजक आरोग्य भारती, सदस्य राष्ट्रीय कार्यकारिणी भाजपा मेडिकल सेल ने बयान में कहा कि जिले स्तर पर कम्बल और अलाव की दुर्व्यवस्था की तरफ ध्यान दिलाना चाहता हूँ। सलोन तहसील में क्षेत्रीय लेखपालों के माध्यम से चिन्हित गरीब, असहाय, विधवाओं में कुल 1404 कंबलों का वितरण होना है। विधायक ने तहसील परिसर में मौजूद गरीब महिलाओं में कुल लगभग 45 कम्बलों का वितरण किया। तहसीलदार राजेश चौरसिया ने बताया कि शेष कंबल तहसील के क्षेत्रीय लेखपालों के सुपुर्द कर दिया गया है जिनका वितरण समय सीमा के अंदर करने के निर्देश दिये जा चुके हैं परन्तु ग्राम्य स्तर पर कम्बल न तो पहुंचे है और न ही उन्हें पहुँचाने की  व्यवस्था शासन द्वारा की गयी है। जिले में अलाव और कंबल वितरण लोग अपने खर्चे से लकड़ी और अलाव का प्रबन्धन कर रहे हैं और हाड़ कपा देने वाली ठंड उन पर ज्यादा सितम ढा रही है, जिनके सिर पर छत नहीं है। उनकी तो दिन-रात हवा के झोंके सहने में गुजर रही है। प्रशासन ने अलाव और कंबल की गर्माहट देने का दावा तो किया, लेकिन हकीकत में सुविधा चंद लोगों तक ही सीमित रह गयी है। 33 लाख का बजट खर्च हो गया, मगर ज्यादातर जरूरतमंद अब भी ठिठुरने के लिए मजबूर हैं जबकि निकाय चुनाव खत्म होते ही शासन ने प्रशासन को कंबल व अलाव की व्यवस्था के निर्देश दिए थे। इसके लिए बजट भी समय से उपलब्ध करा दिया गया था। जिले में तीस लाख के कंबल और तीन लाख रुपये का अलाव जलना था।  योजना के तहत सदर तहसील क्षेत्र में 75 जगहों पर अलाव जलना था लेकिन, हालत ये है कि शहर के मुख्य चैराहों पर ही अलाव नहीं जल रहे हैं। फिरोज गांधी डिग्री कालेज चैराहा, खालसा चैराहा, सुपर मार्केट और घंटाघर में अधिकांश जगहों पर अलाव की लकड़ी नहीं दिखती हैं। रात होते ही जब ठंड का जोर बढ़ता है तो सड़क पर जीवन बिताने वाले कागज, पॉलीथिन तथा कूड़े को जलाकर ठंड से शरीर को बचाने का प्रयत्न करते हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक महराजगंज में तीन सौ, शिवगढ़ में दो सौ और बछरावां में ढाई सौ कंबल बंट गए हैं। इतने कंबल बंटने के बावजूद जनता को ठंड से बचने के लिए लोगों से गुहार करनी पड़ रही है। लालगंज में दो दर्जन स्थानों पर अलाव जलाने का दावा किया जा रहा है। अलाव के नाम पर लकड़ी के छोटे-छोटे लट्ठे डाल दिए गए हैं। वहीं गांवों में अलाव की कोई व्यवस्था नहीं कि गयी है। ऐसे में ग्रामीण स्वयं के संसाधन जुटाकर ठंड से बचने का प्रयत्न कर रहे हैं। सलोन में भी यही हाल हैय ग्रामीण क्षेत्रों में अलाव की व्यवस्था नहीं है। जो 14 सौ कंबल बंटने हैं, उनमें ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ खुशनसीब ही कंबल की गर्मी का सुख ले सके हैं। डलमऊ में 14 सौ कंबल बंटने हैं लेकिन अभी तक समय नहीं आ सका है। इसी का नतीजा है कि 13 सौ कंबल अभी बंटने बाकी हैं। ये कंबल कब वितरित होंगे, यह कहना बड़ा मुश्किल है। परशदेपुर में हालत ये है कि अभी तक एक भी कंबल का वितरण नहीं हो सका है। अलाव के लिए 27 स्थानों का चयन किया गया था, जिसमें 16 जगहों पर अलाव जल रहे हैं। शिवगढ़ में तो दो जगह ही अलाव जल सके हैं। एक भवानीगढ़ चैराहे के पास तो दूसरा सीएचसी के पास जल रहा है। शिवगढ़ में तीन सौ कंबल बंटने हैं, लेकिन अभी तक पहली खेप ही नहीं बंट सकी है। सदर  पांच लाख रुपये के कंबल, 50 हजार रुपये का अलाव स्थिति रू 403 कंबल, 17 जगहों पर अलाव, लालगंज  पांच लाख रुपये के कंबल, 50 हजार रुपये का अलावय स्थिति रू 815 कंबल बंटने का दावा, दो दर्जन स्थानों पर अलाव, ऊंचाहार रू पांच लाख रुपये के कंबल, 50 हजार रुपये का अलाव स्थिति रू 344 लोगों को मिले कंबल, पांच स्थानों पर अलाव, सलोन रू पांच लाख रुपये के कंबल, 50 हजार रुपये का अलाव स्थिति रू 900 कंबल बंटे, एक-दो जगहों पर अलाव, महराजगंज रू 5 लाख रुपये के कंबल, 50 हजार रुपये का अलाव स्थिति रू 750 कंबल बांटने का दावा, 16 जगहों पर अलाव, डलमऊ रू पांच लाख रुपये के कंबल, 50 हजार रुपये का अलाव स्थिति रू सौ कंबल बंटे, एक-दो स्थानों पर अलाव। महराजगंज में कंबल लेने आई महिलाओं को लेखपाल ने भगाया। महराजगंज तहसील क्षेत्र में मंगलवार को कंबल वितरण का कार्यक्रम चल रहा था। क्षेत्र के मोन ग्राम से आई तीन महिलाओं को लेखपाल ने कंबल न होने की बात कहकर भगा दिया। महिलाओं ने जब मामले की जनकारी तहसीलदार तृप्ति गुप्ता को दी तो उन्होंने कंबल दिलाए। इस व्यवस्था के समुचित क्रियान्वयन पर प्रश्न इसलिए उठ रहा है कि जिले में ग्राम्य वार 2-3 कम्बल मिल पा रहे हैं जिसके लिए जन प्रतिनिधियों को पात्र सहित तहसील मुख्यालय पर बुलाया जा रहा है। गम्भीर विषय यह है कि 33 लाख के बजट में आखिर प्रति कम्बल की खरीद प्रक्रिया और मूल्य क्या था कि प्रति ग्राम्य इतने कम कम्बल निर्धारित हो सके? साथ ही कम्बलों के वितरण व्यवस्था मद में वितरित किये जा रहे कम्बलों के मूल्य से अधिक खर्च किये जा रहे हैं जब कि उससे कम खर्च में ग्राम्य स्तर पर वितरण किया जा सकता था। अलाव तो कदाचित ही शायद कहीं जलते दिखाई दें। रैन- बसेरों में बिछाने और ओढ़ने की समुचित व्यवस्था का आभाव अलग से ही एक विषय है। एक गंभीर प्रश्न रायबरेली अपर जिलाधिकारी वित्त एवं राजस्व द्वारा अपने जन्मदिन का उत्सव दीप पैलेस में आयोजित करने पर भी है। ऐसे कार्यक्रमों में अधिकारियों एवं कर्मचारियों द्वारा दिए गए गिफ्ट से होने वाली आय पर प्रश्न चिह्न उठ सकता है। 

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