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किसान हड़ताल पर जा रहे हैं, यह बात सोशल मीडिया पर फैली.

किसान हड़ताल पर जा रहे हैं, यह बात सोशल मीडिया पर फैली. आस-पास के कुछ गाँव भी इसमें जुड़ते चले गए.



शेतकरी संघटना, अखिल भारतीय किसान संघ, मराठा क्रांति मोर्चा जैसे राज्य के 32 किसान संगठनों को लगा कि किसानों की बात में दम है और सरकार के ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ने यह अच्छा मौका है.

ऐसा सोचकर उन्होंने भी इस हड़ताल को समर्थन दिया.

15 मई तक यह बात राज्य भर में फ़ैल गई. छोटे-मोटे कई नेता इससे जुड़ गए.

किसान क्रांति मोर्चा के नाम से ये सारे संगठन एकजुट हो गए. इनकी कई मांगें हैं. सबसे बड़ी मांग है पूर्ण कर्ज़ माफ़ी और न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी.

किसानों की हड़ताल का दूसरा लक्ष्य यह भी था कि शहरों में जाने वाले कृषि उपज को वहां न पहुंचने दिया जाए. किसानों ने एक तरह से नाकेबंदी और अपनी ताकत के प्रदर्शन का फ़ैसला ले लिया.

विरोधी दल कांग्रेस और शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी राज्य सरकार के ख़िलाफ़ किसानों की इस मुहिम से दूर नहीं रह पाए.

शिवसेना जो कि भाजपा सरकार के साथ है, वह भी हड़ताल के समर्थन में उतर गई.

विदर्भ और मराठवाड़ा तो वैसे ही बदहाल हैं. यहाँ किसानों को मनाने की ज़रूरत नहीं पड़ी.

यहाँ के किसान दो दशक से कृषि संकट का सामना कर रहे हैं. मंदी क्या होती है, यहाँ का किसान जानता है.

मामला इतना बड़ा हो गया कि तीन साल का धैर्य और बरसों से इकट्ठा हो रहा किसानों का गुस्सा फूट पड़ा. देश की आर्थिक प्रगति में हम बहुत पीछे रह गए हैं - यह इस आंदोलन को देखकर समझा जा सकता है.


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