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ग्रामीण अर्थ व्यवस्था पर चिंताजनक रिपोर्ट


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार गांवों के विकास पर ध्यान दे रही है और इसके अनकूल योजनाएं भी तैयार करती है। इससे पहले की केन्द्र सरकारें भी यही प्रयास करती रही हैं। बजट प्रावधानों में गांवों का खास ध्यान भी रखा जाता है। इसी प्रकार राज्य सरकारें भी गांवों के विकास के लिए कई योजनाएं बनाए हुए हैं। सभी का यही मानना है कि भारत का समुचित विकास तब तक नहीं हो सकता, जब तक देश के गांव समृद्ध नहीं होंगे। आर्थिक-सामाजिक और जातीय जनगणना की रिपोर्ट तथा मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस ने थोड़ा चिंता में डाल दिया है। मुडीज इन्वेस्टर्स सर्विस ने अपना ताजा रिपोर्ट में कहा है कि देश की अर्थ व्यवस्था में 35 प्रतिशत की हिस्सेदारी करने वाली ग्रामीण अर्थ व्यवस्था चालू वित्त वर्ष में कमजोर रहेगी। गांवों की सामाजिक स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है बल्कि बदतर हो गयी है। ग्राम्य जीवन की खुशहाली का जो वर्णन हमारे साहित्य में मिलता है, उसके ठीक विपरीत गांवों के हालात हैं। वहां जाने पर पता चलता है कि उनकी हालत कितनी खराब हो गयी हैं। इस प्रकार आर्थिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर ग्रामीण क्षेत्र का कमजोर होना चिंताजनक है।
मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस ने अपनी ताजा आंतरिक इण्डिया रिपोर्ट में कहा है कि हालांकि भारत की आर्थिक वृद्धि संभावनाओं को लेकर आशाजनक है लेकिन आर्थिक वृद्धि दर ताजा वित्तीय वर्ष (वर्तमान) में कमजोर बनी रहेगी जो भारत सरकार और देश के बैंकों की साख के प्रतिकूल हैं मुडीज ने चालू वित्त वर्ष के लिए आर्थिक वृद्धि 7.5 प्रतिशत रहने की संभावना जतायी है। मुडीज ने भारत के ग्रामीण क्षेत्र की अर्थ व्यवस्था को लेकर जो सर्वेक्षण कराया है उसमें नरेन्द्र मोदी सरकार की सुधारों की रफ्तार को लेकर निराशा व्यक्त की गयी है। इसमें कहा गया है कि नीतियों में स्थिरता रहने का जोखिम बना हुआ है। आर्थिक सुधारों की धीमी रफ्तार सबसे बड़ा जोखिम है। रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में बहुदलीय, संघीय लोकतंत्र की वजह से भी नीतिगत क्रियान्वयन की रफ्तार धीमी पड़ी है। इसका नतीजा यह है कि आर्थिक
सुधारों का पूरा असर कई सालों के बाद ही सामने आ पाएगा। यह इसलिए चिंताजनक है क्योंकि देश की कुल अर्थ व्यवस्था में ग्रामीण क्षेत्र की अर्थ व्यवस्था 35 प्रतिशत की हिस्सेदारी निभा रही है। मुडीज की रिपोर्ट के खतरे को आर्थिक-सामाजिक और जातीय जनगणना ने भी एक तरह से समर्थन ही दिया है। इस रिपोर्ट के अनुसार गांव में प्रत्येक तीन में एक व्यक्ति ऐसा है जिसके पास अपनी खेती नहीं है और वह मजदूरी करके गुजारा कर रहा है। गांवों में कुल 18 करोड़ परिवार रहते हैं और ढाई करोड़ परिवारों को एक कमरे के कच्चे मकान में गुजारा करना पड़ रहा है। ग्रामीण विकास मंत्री वीरेन्द्र चैधरी ने इस रिपोर्ट के आधार पर गांवों के लिए योजनाएं बनाये जाने की बात कही है ताकि गांवों का समुचित विकास हो सके। वह कहते हैं कि अब अन्त्योदय मिशन का रास्ता साफ होगा और पंचायत गरीबी उन्मूलन योजना के तहत ग्रामीण परिवारों की गरीबी घटायी जा सकेगी।
ग्रामीण क्षेत्र के आर्थिक विकास के लिए सिर्फ योजनाएं बनाना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उन योजनाओं का ईमानदारी से कार्यान्वयन होना भी जरूरी है। केन्द्र और राज्य सरकारें ग्रामीण क्षेत्र के विकास पर पैसा तो बहुत खर्च करती है लेकिन उनका कार्यान्वयन हो रहा है अथवा नहीं, यह देखने की जरूरत नहीं समझी जाती। गांवों में अब भी मुख्य व्यवसाय खेती ही है। आंकड़े बताते हैं कि खेती बहुत कम लोगों के पास रह गयी है। मजदूरी करने वाले ज्यादा हैं। मजदूरी की दर बढ़ गयी है इसका असर कृषि पैदावार पर पड़ रहा है। गांवों में पशुपालन के प्रति रूचि कम हुई है। खेती ट्रैक्टर और थ्रेसर पर आधारित हो गयी। खेत का पूरा भाग ट्रैक्टर से नहीं जोता जा सकता और मजदूर मिलते नहीं हैं तो बहुत से खेत खाली पड़े रहते हैं। जुताई के बाद फसल उगाने के लिए उन्नतशील बीज, खाद आदि की आपूर्ति सहकारी संस्थाएं नहीं कर पातीं। इस प्रकार नकली खाद और घटिया किस्म के बीज बाजारों से लेकर बुवाई करनी पड़ती है। इसका सीधा प्रभाव फसल पर पड़ता है। खर-पतवार निराई भी ठीक से नहीं हो पाती। सिंचाई के साधन पर्याप्त नहीं हैं। नहरों में ठीक से सफाई भी नहीं की जाती, इसलिए जब जरूरत होती है तब नहरों में पानी नहीं मिलता। बिजली वाले गांवों में सरकार ने नलकूप बनवा रखे हैं जो अक्सर खराब रहते हैं। उनका संचालन करने वाला लापरवाही बरतता है।


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