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जदयू के भाजपा से हाथ मिलाने के साथ मैत्रीपूर्ण क्षेत्रीय दलों के समर्थन से राजग की संख्या राज्यसभा में बहुमत के काफी करीब पहुंच गयी है जिससे सरकार के विधायी एजेंडे को बढ़ावा मिलेगा। निर्दलीय एवं नामित सदस्यों के अलावा विभिन्न दलों के संख्या बल की गणना से पता चलता है कि मोदी सरकार संसद के 245 सदस्यीय ऊपरी सदन में कम से कम 121 सदस्यों से समर्थन की उम्मीद कर सकती है। सदन में समन्वय स्थापित करने वाले राजग नेताओं के चुस्त राजनीतिक प्रबंधन से उसे कांग्रेस नेतृत्व वाले विपक्ष की चुनौती से सफलतापूर्वक निपटने में मदद मिल सकती है क्योंकि कांग्रेस राज्यसभा में सरकार के विधेयकों को अवरूद्ध करने में अकसर सफल रही है।

नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली पार्टी के ऊपरी सदन में 10 सदस्य हैं जो अब तक सदन में अल्पमत में रहे सत्तापक्ष में महत्वपूर्ण इजाफा है।
कुल 26 सदस्यों वाले अन्नाद्रमुक, बीजद, टीआरएस, वाईएसआर कांग्रेस पार्टी और इनेलोद जैसे क्षेत्रीय दलों ने अकसर सरकार का समर्थन किया है और साथ ही सरकार आठ नामित सदस्यों में से कम से कम चार पर समर्थन के लिए निर्भर कर सकती है। इन सबको मिलाकर संख्या 121 होती है जो 123 के बहुमत के आंकड़े के बेहद करीब है। अगर भाजपा अगले वर्ष उत्तर प्रदेश के नौ में से आठ सीटें जीतती है तो मानसून सत्र के दौरान उसके मनोबल को बढ़ावा मिलेगा। इस समय उसके पास केवल एक सीट है। हालांकि बिहार में राजग की उल्टी गंगा बह सकती है जहां अगले साल मार्च-अप्रैल में छह सीटों के लिए चुनाव होंगे। इस समय जदयू और भाजपा के पास क्रमश: चार और दो सीटे हैं। राजद-कांग्रेस गठबंधन तीन तक सीटें जीत सकता है।
 
जदयू के समर्थन के साथ 245 सदस्यीय सदन में राजग का संख्या बल बढ़कर 89 हो गया। पार्टी के कुछ सदस्यों ने भाजपा से हाथ मिलाने के नीतीश के फैसले की आलोचना की है लेकिन यह साफ नहीं है कि क्या वह संसद में पार्टी के रूख के उलट काम करेंगे। अनिल माधव दवे के निधन से रिक्त हुई मध्य प्रदेश की राज्यसभा सीट के उपचुनाव में भाजपा की जीत तय होने तथा गुजरात में कांग्रेस से एक सीट छीनने के लिए उसके कोई कसर ना छोड़ने के साथ मौजूदा संसद सत्र के दौरान उसका संख्या बल बढ़कर 91 हो सकता है।
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छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए अमित शाह ने कहा कि अभी राष्ट्रपति चुनाव पर कुछ निर्णय नहीं लिया गया है। जब भी इस संबंध में कुछ तय होगा सबको पता चल जाएगा।
चुनाव आयोग ने राष्ट्रपति चुनावों की घोषणा कर राजनीतिक पारा बढ़ा दिया है बता दें कि चुनाव आयोग ने राष्ट्रपति चुनाव की तारीखों की घोषणा कर दी है। चुनाव 17 जूलाई को होगा और चुनाव के परिणाम 20 जूलाई को घोषित होगा।
राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल 25 जुलाई को खत्म हो रहा है।
वहीं भारतीय जनता पार्टी  अभी भी इस मुद्दे पर पत्ते खोलने को तैयार नहीं है। इसका नजारा उस समय दिखा जब छत्तीसगढ़ पहुंचे अमित शाह ने यह कहकर सबको चौंका दिया कि पार्टी ने अभी इस मुद्दे पर कुछ सोचा ही नहीं है।

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एम वेंकैया नायडू को भारत का अगला उपराष्ट्रपति चुन लिया गया है. वेंकैया नायडू सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले एनडीए गंठबंधन के उम्मीदवार थे. वेंकैया नायडू को विपक्ष के उम्मीदवार के रूप में पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल और महात्मा गांधी के पोते गोपालकृष्ण गांधी चुनौती दे रहे थे. वेंकैया नायडू 11 अगस्त को उपराष्ट्रपति पद की शपथ लेंगे.

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आंदोलन से अब तक खुद को दूर रख रहे भारतीय किसान संघ के मेंबर्स ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा, "यह आंदोलन हमारे बैनर तले हो रहा है, लेकिन हिंसा करने वाले हमारे लोग नहीं हैं।"
 प्रोविंशियल ट्रेजरर लक्ष्मीनारायण पटेल ने कहा, "आंदोलन में हम हिंसक घटनाओं का समर्थन नहीं कर रहे हैं। उम्मीद है सरकार एक-दो दिन में हमें चर्चा के लिए बुलाकर किसानों के हित में फैसले लेगी। एेसा नहीं हुआ तो आंदोलन 10 जून तक या इससे आगे भी चल सकता है।
 
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चंगेज़ ख़ान, तारीख़ के पन्नों में दर्ज एक ऐसा नाम है जिससे शायद ही कोई नावाक़िफ़ हो. उसके ज़ुल्म और बहादुरी की कहानियां दुनियाभर में मशहूर हैं.

उसकी फ़ौजें जिस भी इलाक़े से गुज़रती थीं अपने पीछे बर्बादी की दास्तान छोड़ जाती थीं. कहने को तो वो मंगोल शासक था, लेकिन उसने अपनी तलवार के बल पर एशिया के एक बड़े हिस्से पर क़ब्ज़ा कर लिया था. इतिहास में इतने बड़े हिस्से पर आज तक किसी ने कब्ज़ा नहीं किया.

दुनियाभर में जितने भी बड़े महाराजा, सुल्तान या बादशाह रहे उनके मरने के बाद भी मक़बरों की शक्ल में उनके निशान बाक़ी रहे. ये मक़बरे शायद इसलिए बनाए गए क्योंकि वो चाहते थे कि लोग उन्हें हमेशा याद रखें. लेकिन हैरत की बात है कि चंगेज़ ख़ान ने अपने लिए एक अजीब वसीयत की थी. वो नहीं चाहता था कि उसके मरने के बाद उसका कोई निशान बाक़ी रहे.

लिहाज़ा उसने अपने साथियों को आदेश दिया कि उसके मरने के बाद उसे किसी गुमनाम जगह पर दफ़नाया जाए. वसीयत के मुताबिक़ ऐसा ही किया गया. सैनिकों ने उसे दफ़नाने के बाद उसकी क़ब्र पर क़रीब एक हज़ार घोड़ों को दौड़ाकर ज़मीन को इस तरह से बराबर कर दिया ताकि कोई निशान बाक़ी ना रहे.

मंगोलिया के रहने वाले चंगेज़ ख़ान की मौत के बाद आठ सदियां बीत चुकी हैं. इसे लेकर तमाम मिशन चलाए गए, लेकिन उसकी क़ब्र का पता नहीं चला. नेशनल जियोग्राफ़िक ने तो सैटेलाइट के ज़रिए उसकी क़ब्र तलाशने की कोशिश की थी. इसे वैली ऑफ़ ख़ान प्रोजेक्ट का नाम दिया गया था.

सऊदी अरब का वो खामोश शहर

दुनिया के दो देशों की इस दोस्ती को जानते हैं?

दिलचस्प बात है कि चंगेज़ ख़ान की क़ब्र तलाशने में विदेशी लोगों की ही दिलचस्पी थी. मंगोलिया के लोग चंगेज़ ख़ान की क़ब्र का पता लगाना नहीं चाहते. इसकी बड़ी वजह एक डर भी है. कहा जाता रहा है कि अगर चंगेज़ ख़ान की क़ब्र को खोदा गया तो दुनिया तबाह हो जाएगी. लोग इसकी मिसाल देख भी चुके थे. इसलिए भी उनके दिलों में वहम ने अपनी जगह पुख़्ता कर रखी है.

कहा जाता है कि 1941 में जब सोवियत संघ में, चौदहवीं सदी के तुर्की- मंगोलियाई शासक तैमूर लंग' की क़ब्र को खोला गया तो नाज़ी सैनिकों ने सोवियत यूनियन को खदेड़ डाला था. इस तरह सोवियत संघ भी दूसरे विश्व युद्ध में शामिल हो गया था. इसीलिए वो नहीं चाहते थे कि चंगेज़ ख़ान की क़ब्र को भी खोला जाए. कुछ जानकार इसे चंगेज़ ख़ान के लिए मंगोलियाई लोगों का एहतराम मानते हैं. उनके मुताबिक़ चूंकि चंगेज़ ख़ान ख़ुद नहीं चाहता था कि उसे कोई याद रखे. लिहाज़ा लोग आज भी उसकी ख़्वाहिश का सम्मान कर रहे हैं.

परंपरावादी हैं मंगोलियाई

मंगोलियाई लोग बहुत परंपरावादी रहे हैं. वो अपने बुज़ुर्गों का उनके गुज़र जाने के बाद भी उसी तरह से आदर करते हैं जैसा उनके जीते जी करते थे. आज भी जो लोग ख़ुद को चंगेज़ खान का वंशज मानते हैं वो अपने घरों में चंगेज़ खान की तस्वीर रखते हैं.

तलाक़ ना हो इसके लिए काम आता था ये कमरा

जो लोग चंगेज़ ख़ान की क़ब्र तलाशने के ख़्वाहिशमंद थे उनके लिए ये काम आसान नहीं था. चंगेज़ ख़ान की तस्वीर या तो पुराने सिक्कों पर पाई जाती है या फिर वोदका की बोतलों पर. बाक़ी और कोई ऐसा निशान नहीं है जिससे उन्हें मदद मिली हो. रक़बे के हिसाब से मंगोलिया इतना बड़ा है कि उसमें ब्रिटेन जैसे सात देश आ जाएं. अब इतने बड़े देश में एक नामालूम क़ब्र तलाशना समंदर में से एक ख़ास मछली तलाशने जैसा है. ऊपर से मंगोलिया एक पिछड़ा हुआ मुल्क़ है. कई इलाक़ों में पक्की सड़कें तक नहीं हैं. आबादी भी कम ही है.

90 के दशक में जापान और मंगोलिया ने मिलकर चंगेज़ ख़ान की क़ब्र तलाशने के लिए एक साझा प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू किया. जिसका नाम था 'गुरवान गोल'. इस प्रोजेक्ट के तहत चंगेज़ ख़ान की पैदाइश की जगह माने जाने वाले शहर खेनती में रिसर्च शुरू हुई.

लेकिन इसी दौरान इसी साल मंगोलिया में लोकतांत्रिक क्रांति हो गई. जिसके बाद कम्युनिस्ट शासन ख़त्म हो गया और लोकतांत्रिक राज क़ायम हो गया. नई सरकार में 'गुरवान गोल' प्रोजेक्ट को भी रुकवा दिया गया.

मंगोलिया की उलानबटोर यूनिवर्सिटी के डॉ. दीमाजाव एर्देनबटार 2001 से जिंगनू राजाओं की क़ब्रगाहों की खुदाई कर उनके बारे में जानने की कोशिश कर रहे हैं. माना जाता है कि जिंगनू राजा मंगोलों के ही पूर्वज थे. ख़ुद चंगेज़ ख़ान ने भी इस बात का ज़िक्र किया था. लिहाज़ा इन राजाओं की क़ब्रगाहों से ही अंदाज़ा लगने की कोशिश की जा रही है कि चंगेज़ ख़ान का मक़बरा भी उनके मक़बरों जैसा ही होगा.

आपने देखा है ईरान में गुफाओं वाला गांव

जिंगनू राजाओं की क़ब्रें ज़मीन से क़रीब 20 मीटर गहराई पर एक बड़े कमरेनुमा हैं. जिसमें बहुत-सी क़ीमती चीज़ें भी रखी गई हैं. इनमें चीनी रथ, क़ीमती धातुएं, रोम से लाई गई कांच की बहुत-सी चीजें शामिल हैं. माना जाता है कि चंगेज़ ख़ान की क़ब्र भी ऐसी ही क़ीमती चीज़ों से लबरेज़ होगी जो उसने अपने शासनकाल में जमा की होंगी.

डॉक्टर एर्देनबटोर को लगता है कि चंगेज़ ख़ान की क़ब्र शायद ही तलाशी जा सके.

मंगोलिया में प्रचलित क़िस्सों के हिसाब से चंगेज़ ख़ान को 'खेनती' पहाड़ियों में बुर्ख़ान ख़ालदुन नाम की चोटी पर दफ़नाया गया था. स्थानीय क़िस्सों के मुताबिक़ अपने दुश्मनों से बचने के लिए चंगेज़ ख़ान यहां छुपा होगा और मरने के बाद उसे वहीं दफ़नाया गया होगा. हालांकि कई जानकार इस बात से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते.

विश्व विरासत का शहर उलानबटोर

उलानबटोर यूनिवर्सिटी में इतिहास पढ़ाने वाले सोडनॉम सोलमॉन कहते हैं कि मंगोलियाई लोग इन पहाड़ियों को पवित्र मानते हैं. लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि चंगेज़ ख़ान को यहां दफ़नाया गया होगा. इन पहाड़ियों पर शाही ख़ानदान के सिवा किसी और को जाने की इजाज़त नहीं है. इस इलाक़े को मंगोलियाई सरकार की तरफ़ से संरक्षित रखा गया है. यूनेस्को ने भी इसे विश्व विरासत का दर्जा दिया है. लेकिन कोई भी रिसर्च आज तक ये नहीं बता पाई है कि वाक़ई में यहीं चंगेज़ ख़ान की क़ब्र है.

वो गांव जिसने नई दुनिया को दो हिस्सों में बांट दिया!

चंगेज़ ख़ान ज़माने के लिए एक योद्धा था. ज़ालिम था. जो तलवार के बल पर सारी दुनिया को फ़तह करना चाहता था. लेकिन मंगोलियाई लोगों के लिए वो उनका हीरो था. जिसने मंगोलिया को पूर्वी और पश्चिमी देशों से जोड़ा. सिल्क रोड को पनपने का मौक़ा दिया. उसी ने मंगोलिया के लोगों को धार्मिक आज़ादी का एहसास कराया. उसके शासन काल में मंगोलियाई लोगों ने काग़ज़ की करेंसी की शुरूआत की. डाक सेवा की शुरूआत की. चंगेज़ ख़ान ने मंगोलिया को ऐसा सभ्य समाज बनाया.

मंगोलिया के लोग चंगेज़ ख़ान का नाम बडी इज़्ज़त और फ़ख़्र से लेते हैं. इनके मुताबिक़ अगर चंगेज़ ख़ान ख़ुद चाहता कि उसके मरने के बाद भी लोग उसे याद करें तो वो कोई वसीयत नहीं करता. अगर वो चाहता तो कोई ना कोई अपनी निशानी ज़रूर छोड़ता. यही वजह है कि मंगोलियाई लोग नहीं चाहते कि अब उसकी क़ब्र की तलाश की जाए. जो वक़्त की धुंध में कहीं गुम हो चुका है उसे फिर ना कुरेदा जाए.

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किसान हड़ताल पर जा रहे हैं, यह बात सोशल मीडिया पर फैली. आस-पास के कुछ गाँव भी इसमें जुड़ते चले गए.



शेतकरी संघटना, अखिल भारतीय किसान संघ, मराठा क्रांति मोर्चा जैसे राज्य के 32 किसान संगठनों को लगा कि किसानों की बात में दम है और सरकार के ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ने यह अच्छा मौका है.

ऐसा सोचकर उन्होंने भी इस हड़ताल को समर्थन दिया.

15 मई तक यह बात राज्य भर में फ़ैल गई. छोटे-मोटे कई नेता इससे जुड़ गए.

किसान क्रांति मोर्चा के नाम से ये सारे संगठन एकजुट हो गए. इनकी कई मांगें हैं. सबसे बड़ी मांग है पूर्ण कर्ज़ माफ़ी और न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी.

किसानों की हड़ताल का दूसरा लक्ष्य यह भी था कि शहरों में जाने वाले कृषि उपज को वहां न पहुंचने दिया जाए. किसानों ने एक तरह से नाकेबंदी और अपनी ताकत के प्रदर्शन का फ़ैसला ले लिया.

विरोधी दल कांग्रेस और शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी राज्य सरकार के ख़िलाफ़ किसानों की इस मुहिम से दूर नहीं रह पाए.

शिवसेना जो कि भाजपा सरकार के साथ है, वह भी हड़ताल के समर्थन में उतर गई.

विदर्भ और मराठवाड़ा तो वैसे ही बदहाल हैं. यहाँ किसानों को मनाने की ज़रूरत नहीं पड़ी.

यहाँ के किसान दो दशक से कृषि संकट का सामना कर रहे हैं. मंदी क्या होती है, यहाँ का किसान जानता है.

मामला इतना बड़ा हो गया कि तीन साल का धैर्य और बरसों से इकट्ठा हो रहा किसानों का गुस्सा फूट पड़ा. देश की आर्थिक प्रगति में हम बहुत पीछे रह गए हैं - यह इस आंदोलन को देखकर समझा जा सकता है.

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रिलायंस जियो की शुक्रवार को हुई सालाना आम बैठक में कंपनी के चेयरमैन मुकेश अंबानी ने जियो फ़ोन को लॉन्च किया.

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार जियो फ़ोन की इफेक्टिव कीमत शून्य रुपये रखी गई है. यानी उपभोक्ता को ये फ़ोन 1500 रुपये की वापस मिलने वाली सिक्योरिटी राशि के साथ मुफ्त में मिलेगा. कंपनी का दावा है कि उसके इस फ़ोन में वे सारे फीचर्स मौजूद हैं जो बाज़ार में उपलब्ध तीन से साढ़े चार हज़ार कीमत के स्मार्टफ़ोन में हैं.

कंपनी ने कहा कि जियो फ़ोन की प्री बुकिंग 24 अगस्त से होगी और ये फ़ोन मेड इन इंडिया होंगे.

मुकेश अंबानी एक तरफ सालाना आम बैठक में भाषण दे रहे थे, वहीं प्रतिद्वंद्वी कंपनियों भारती एयरटेल, आइडिया सेल्युलर और उनके भाई अनिल भाई की कंपनी रिलायंस कम्युनिकेशंस के शेयर औंधे मुंह गिरते जा रहे थे.

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राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी कल (2 मई, 2017 को) लवली प्रोशेशनल यूनिवर्सिटी के 8वें दीक्षांत समारोह में हिस्सा लेने के लिए पंजाब (फगवाड़ा) जाएंगे।

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फ़ोर्ब्स मैग्ज़ीन के मुताबिक़ शाहरुख़ ख़ान पिछले साल भारत के सबसे ज़्यादा कमाई करने वाले सेलेब्रिटी हैं.

मैग्ज़ीन ने दुनिया भर के सौ सबसे ज़्यादा कमाई करने वाले सेलेब्रिटीज़ की लिस्ट बनाई है जिसमें भारत से शाहरुख़ ख़ान, सलमान ख़ान और अक्षय कुमार शामिल हैं.
शाहरुख़ ख़ान की साल 2016 में कुल 38 मिलियन डॉलर यानी 244 करोड़ रुपए रही. वो इस सूची में 65वें नंबर पर रहे.

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छत्तीसगढ़ के सुकमा में हर तरफ सन्नाटा और खौफ पसरा है. जो अब लंबा खिंचता चला जा रहा है.

वजह ये है कि बस्तर में नक्सली हिंसा की जितनी भी बड़ी वारदातें हुई हैं वो इसी इलाके में हुई हैं.

ये वो इलाका है जहां सुरक्षा बलों ने सबसे ज्यादा नुकसान उठाया है. सबसे ज्यादा जवान हताहत हुए हैं.

बात अगर नक्सलियों की हो तो साल 2010 में जब सुकमा के ही ताड़मेटला में सीआरपीएफ के 76 जवानों की मौत हुई थी तब से लेकर आज तक जवाबी कार्रवाई में सुरक्षा बलों को नक्सलियों के खिलाफ कभी कोई बड़ी सफलता नहीं मिली.

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