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सपा सरकार ने जवाहर बाग रामवृक्ष को सौंपने की कर ली थी तैयारी

 

मथुरा हिंसा को लेकर तमाम आरोप-प्रत्यारोपों के बीच एक सनसनीखेज खुलासा हुआ है। जानकारी के अनुसार, जिस जवाहर बाग को खाली कराने में एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी व एसओ फरह संतोष यादव शहीद हो गए और 29 लोगों की मौत हुई, उस बाग को सपा सरकार ने कब्जाधारियों के मुखिया रामवृक्ष यादव को 90 साल की लीज पर देने की तैयारी कर ली थी। रामवृक्ष ने शासन से धार्मिक और सामाजिक कार्यों के लिए बाग मांगा था।

अदालत में मामला पहुंचने से बिगड़ गया खेल
मार्च 2015 में इसका प्रस्ताव भी शासन को पहुंच गया था। यदि मामला अदालत नहीं पहुंचता तो यह बेशकीमती बाग कब्जाधारियों को दे दिया गया होता।

अलग आश्रम बनाना चाहता था रामवृक्ष
कभी बाबा जयगुरुदेव के प्रमुख शिष्यों में शामिल रहने वाला रामवृक्ष भी बिलकुल उसी तरह से ही अपना अलग आश्रम स्थापित करना चाहता था। पहले तो उसकी निगाह बाबा जय गुरुदेव आश्रम की भूमि पर ही थी, लेकिन जब वह इसमें कामयाब नहीं हो पाया तो उसने सत्याग्रह के नाम पर जवाहर बाग को कब्जा लिया। दो दिन के लिए अनुमति लेने वाला रामवृक्ष वहीं पर जम गया। यह बिना सियासी संरक्षण के संभव नहीं था। उसकी सरकार में पकड़ का ही नतीजा है कि 280 एकड़ के जवाहर बाग को वह पट्टे पर मांग रहा था। सरकार भी देने को तैयार थी।

जय गुरुदेव आश्रम के विवाद हुआ तो मंत्री ने निकाला था बीच का रास्ता
बताया जाता है रामवृक्ष जय गुरुदेव आश्रम की भूमि पर काबिज होना चाहता था, जिसे लेकर विवाद हुआ तो प्रदेश सरकार के एक कद्दावर मंत्री ने दोनों का विवाद खत्म कराने के लिए बीच का रास्ता निकाला और रामवृक्ष से जवाहर बाग को 90 साल के पट्टे पर लेने के लिए प्रस्ताव मांगा गया। प्रस्ताव पहुंचने के बाद प्रशासन से भी राय ली गई थी। बताया जाता है कि शुरूआत में प्रशासन की राय लीज प्रस्ताव के खिलाफ थी। लेकिन बाद में दबाव में आकर प्रक्रिया भी शुरू कर दी।

कोर्ट के आदेश के बाद भी नहीं खाली करवाया बाग
इसी बीच वरिष्ठ अधिवक्ता विजयपाल सिंह तोमर पूरे मामले को लेकर 22 मई 2015 को हाईकोर्ट पहुंच गए। उनकी याचिका पर हाईकोर्ट से बाग को तत्काल खाली कराने का आदेश हो गए। प्रशासन सरकार के इतने दबाव में था कि बाग खाली नहीं कराया गया। अवमानना का भी मामला बन रहा था। लिहाजा प्रशासन को कार्रवाई करनी पड़ी थी


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