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इसराइल के साथ संबंधों का महत्व

 

 

 

केन्द्र सरकार ने फलस्तीन को समर्थन देने की परम्परागत भारतीय विदेश नीति में कोई बदलाव नहीं किया है। लेकिन ऐसा लग रहा है कि सरकार राष्ट्रीय हितों के मद्देनजर इसमें नई रणनीति को शामिल करना चाहती है। इसके तहत इसराइल के साथ कतिपय महत्वपूर्ण विषयों पर सहयोग शुरू किया जायेगा। इसराइल ने इसके प्रति तत्परता दिखाई। ये विषय दशकों से लंबित थे। भारत को इसका लाभ मिलना था। लेकिन फलस्तीन मुद्दे पर पिछली सरकारों का संकोच आगे बढ़ने नहीं दे रहा था। एक बार संप्रग सरकार ने भी दबे मन से इसकी आवश्यकता स्वीकार की थी, लेकिन वह भी कारगर पहल करने का साहस नहीं दिखा सकी।
यदि वर्तमान सरकार इस संबंध में कोई फैसला करती है, तो उसे राष्ट्रहित के अनुकूल माना जा सकता है। फिलहाल पहले भारतीय विदेश मंत्री और बाद में प्रधानमंत्री की इसराइल यात्रा का कार्यक्रम है। इससे संबंधों में कितना सुधार होगा, तथा भारत जिस लाभ की उम्मीद कर रहा है, यह तो भविष्य में दिखाई देगा। लेकिन इसमें संदेह नहीं कि फलस्तीन को समर्थन तथा इसराइल के साथ तकनीक, सीमा पार के आतंकवाद जैसे मसलों पर एक साथ अमल किया जा सकता है। हम इसराइल के साथ उन मसलों पर द्विपक्षीय सहयोग बढ़ा सकते हैं, जिसका फलस्तीन मुद्दे से कोई टकराव नहीं है। इसका अरब जगत के अन्य देशों से भी रिश्तों में प्रतिकूल प्रभाव नहीं होगा। ऐसा नहीं कि इन दोनों को एक साथ स्वीकार करने वाला भारत पहला देश होगा।
मध्यपूर्व के कई मुस्लिम देश भी इसराइल से बहुत पहले द्विपक्षीय समझौते कर चुके हैं। इसका यह मतलब नहीं कि उन्होंने फलस्तीनों को समर्थन देना बन्द कर दिया है। लेकिन इन्हेंाने फलस्तीनियों के साथ ही अपने मुल्कों के राष्ट्रीय हित को भी महत्व दिया। उसी के अनुरूप विदेश नीति में बदलाव किया। जब मुस्लिम देश ऐसा कर सकते हैं, तो भारत का संकोच अनावश्यक था। ऐसे में भारत के भीतर इसे साम्प्रदायिक रंग देने का प्रयास नहीं होना चाहिए। सीमापार के आतंकवाद पर इसराइल की रणनीति बेजोड़ मानी जाती है।
इस संबंध में भारत और इसराइल के बीच समझौता दशकों पहले हो जाना चाहिए था। इसी प्रकार तकनीक के कई विषयों पर भी समझौते की गंुजाइश है। सीमापार के आतंकवाद का भारत दशकों से सामना कर रहा है। इसका मुकाबला हमको स्वयं करना है। इसके लिये यदि इसराइल के सहयोग की आवश्यकता हो, तो उसे हासिल करने में कोई हर्ज नहीं है। यदि नरेन्द्र मोदी सरकार इस दिशा में साहस दिखा रही है, तो उसका राष्ट्रहित में स्वागत होना चाहिए।
विदेश नीति के इस बदलाव को सकारात्मक नजरिए से देखना होगा। इसके तहत गत सप्ताह भारत ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में इसराइल के खिलाफ लाए गये एक प्रस्ताव पर पहली बार मतदान से अपने को अलग रखा। पिछले वर्ष गाजा पट्टी संघर्ष में इसराइल द्वारा किये गये युद्ध अपराध को लेकर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया था। इसमें गौरतलब यह है कि भारत ने पूरे प्रस्ताव पर अपना कदम नहीं उठाया था, वरन् इस प्रस्ताव में अन्तर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय का संदर्भ दिये जाने के कारण ही मतदान से अपने को अलग किया था। अमेरिका ने प्रस्ताव का विरोध किया था। वह चाहता था कि भारत में विरोध में मतदान करे। लेकिन भारत ने ऐसा नहीं किया। भारत के साथ पांच अन्य देशों ने मतदान में भाग नहीं लिया था। भारत ने साफ किया कि इसराइल हो या हमास जैसे आतंकी संगठन, युद्ध अपराध को रोकना ही होगा। लेकिन अन्तर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय का संदर्भ इस समस्या का समाधान नहीं है। ऐसा भी नहीं कि भारत ने अन्य मामले में ऐसा पहली बार किया है। पिछले सरकार के कार्यकाल में जब सीरिया और उत्तर कोरिया पर मानवाधिकार परिषद के प्रस्ताव में अन्तर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय का संदर्भ दिया गया था, तब भी भारत ने मतदान में भाग नहीं लिया था। जाहिर है वर्तमान समय में उसी नीति पर अमल किया गया। अन्तर इतना है कि नजीर का यह निर्वाह इसराइल के साथ संबंधों में सहायक बन गया। भारत उसी नीति पर अमल कर रहा है जिस पर सीरिया और उत्तर कोरिया मामले में अमल किया गया था। ये बात अलग है कि इसराइल ने इसे अपने पक्ष में माना। वैसे भी इसराइल के किसी कदम की आलोचना में हमास की गतिविधियों को भी शामिल करना चाहिए। कई बार हमास संगठन फलस्तीन की सरकार पर भी हमला बोलता है। आतंकवाद से किसी समस्या का
समाधान नहीं हो सकता। हमास ने यहां की समस्या को अधिक जटिल बनाया है। कई बार वह जानबूझ कर उकसाने वाली कार्रवाई करता है। दूसरी ओर सीमा पार के आतंकी हमलों का उसी प्रकार जवाब देना इसराइल की स्थायी नीति है। वहां सरकारें बदलती हैं, लेकिन इस नीति में कोई बदलाव नहीं होता। वह अपने एक भी नागरिक या सैनिक का हमास जैसे संगठनों के हमले से हुई मौत को बर्दास्त नहीं करता। भले ही उसकी आलोचना की जाए, लेकिन वह जवाब देने में देर नहीं करता।
भारत प्रत्येक पक्ष के द्वारा की जाने वाली हिंसा का विरोध करता है। विदेश नीति के इस तत्व पर कोई बदलाव नहीं हुआ है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने संयुक्त राष्ट्र संघ में मतदान से अलग होने पर यही प्रतिक्रिया दी। उन्हांेने कहा कि फलस्तीन को नई दिल्ली के समर्थन में कोई बदलाव नहीं होगा। यह भारत के लिये अच्छा है कि फलस्तीन पर मूलभूत नीति में बदलाव ना करने के बावजूद इसराइल द्विपक्षीय संबंध बढ़ाने को उत्सुक हैं। उसने मतदान से अलग रहने पर भारत को धन्यवाद दिया। वैसे विदेश नीति में राष्ट्रहित स्थायी और सर्वोच्च होता है। भारत को जो तकनीक दुनिया में कहीं से हासिल नहीं हो रही है, उसे इसराइल दे रहा है। इस संबंध को आगे बढ़ाना होगा। सीमापार के आतंकवाद को रोकने में इसराइल के साथ सहयोग लाभप्रद हो सकता है।


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