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दीपा करमाकर ने दी जिमनास्टिक को पहचान

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रियो ओलंपिक से पहले भारत में जिमनास्टिक की पहचान न के बराबर थी लेकिन खेलों का महाकुंभ समाप्त होते ही सबकी जुबां पर जिमनास्टिक का नाम आ चुका था और इस खेल को नयी पहचान दिलाने का श्रेय जाता है त्रिपुरा की दीपा करमाकर को।

ओलंपिक जैसे बड़े मंच पर पहली बार उतरना ही खिलाड़ी के लिये विशेष उपलब्धि होती है लेकिन बहुत कम खिलाड़ी ऐसे होते हैं जो अपना नाम और मुकाम दोनों बना जाते हैं। यह कहावत रियो ओलंपिक में त्रिपुरा की जिमनास्ट दीपा पर खरी उतरती है जो ओलंपिक में अपने प्रदर्शन से पूरे देश की लाडली बन गयीं।

रियो ओलंपिक के बाद जिमनास्टिक, प्रोदुनोवा वॉल्ट और दीपा एक दूसरे के पूरक बन गये हैं। ओलंपिक खेलों के लिये क्वालीफाई करने वाली पहली भारतीय महिला जिमनास्ट होने का गौरव हासिल करने वाली दीपा रियो में अपनी वॉल्ट स्पर्धा में पदक पाने से चूक गईं लेकिन उन्होंने चौथा स्थान हासिल कर 125 करोड़ देशवासियों का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया। 

दीपा से पहले देश में जिमनास्टिक को कभी गौर से नहीं देखा जाता था लेकिन दीपा के प्रदर्शन के बाद जिमनास्टिक आकर्षण का केन्द्र बन गया है। भारत रत्न सचिन तेंदुलकर, बॉलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन, निशानेबाज अभिनव भबद्रा और क्रिकेटर वीरेन्द्र सहवाग जैसी हस्तियों ने दीपा की कामयाबी को सलाम किया।

दीपा ने इस प्रदर्शन से अपना नाम ओलंपिक में शानदार प्रदर्शन करने वाली महिला खिलाड़यिों पीटी ऊषा, कर्णम मल्लेश्वरी, अंजलि भागवत, सायना नेहवाल, सानिया मिर्जा जैसी खिलाड़यिों में शुमार करा लिया। दीपा ने इसके साथ ही आमतौर पर उपेक्षित रहने वाले पूर्वोत्तर क्षेत्र को भी गौरवान्वित किया। दीपा ने अपने इस प्रदर्शन का सारा श्रेय कोच बिसेश्वर नंदी को देते हुये कहा था कि वह उनके लिये भगवान की तरह हैं।

उनके इस प्रदर्शन ने उन्हें देश का सर्वाेच्च राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार और नंदी को द्रोणाचार्य पुरस्कार दिला दिया। दीपा की यह उपलब्धि इसलिये भी मायने रखती है क्योंकि बाकी अन्य भारतीय एथलीटों की तरह दीपा ने विदेशों में जाकर महंगे और विदेशी कोचों से कोई ट्रेभनग नहीं ली है।

वर्ष 2014 राष्ट्रमंडल खेलों की कांस्य पदक विजेता और इस वर्ष विश्व चैंपियनशिप में पांचवें स्थान पर रहीं दीपा के कोच नंदी ने विदेश में ट्रेभनग लेने से इंकार कर दिया था। उन्होंने कहा था, दीपा जब भारत में ट्रेभनग से क्वालीफाई कर सकती है तो अब विदेश जाने की जरूरत क्या है।

23 वर्षीय दीपा ने देश की लड़कियों को अपने संदेश में कहा था, मेरा संदेश देश की सभी लड़कियों को है कि महिलाएं किसी चीज में पीछे नहीं है और मेहनत से वह सबकुछ हासिल कर सकती हैं।

दीपा रियो ओलंपिक की जिमास्टिक की वॉल्ट स्पर्धा में चौथा स्थान हासिल कर पदक पाने से चूक गई थीं लेकिन उन्होंने अपने प्रदर्शन से भारत के खेल इतिहास में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज करा लिया। दीपा ओलंपिक में 52 वर्षों में उतरने वाली पहली भारतीय जिमनास्ट और रियो के लिये क्वालीफाई करने वाली एकमात्र जिमनास्ट थीं।

त्रिपुरा की दीपा ने 15.066 के औसत स्कोर के साथ चौथा स्थान हासिल किया। उन्होंने अपने मुकाबले के बाद कहा जिन तीन खिलाड़यिों को पदक मिला वे निश्चित तौर पर मुझसे बेहतर थीं। लेकिन यह मेरे पहले ओलंपिक हैं और मैं अपने अनुभव से खुश हूं। मैंने जो कुछ भी ट्रेभनग में सीखा था उसे लागू किया। लेकिन देश को पदक नहीं दिला पाने से मैं दुखी हूं।

23 वर्षीय दीपा ने लेकिन विश्वास जताया था कि वह अगले ओलंपिक में पदक जरूर लेकर आएंगी। उन्होंने कहा मैं भविष्य में बेहतर करने की कोशिश करती रहूंगी और 2020 के टोक्यो ओलंपिक में अपने देश के लिये पदक लाने की पूरी कोशिश करूंगी। जीतना और हारना खेल का हिस्सा होता है।

उन्होंने कहा था मैं प्रोदुनोवा में अच्छा करने को लेकर आश्वस्त थी। मैं अपने दोनों वोल्ट अच्छे से करना चाहती थी। मैं इस बार रजत या कांस्य की ही सोच रही थी लेकिन अगली बार तो मेरा लक्ष्य सिर्फ स्वर्ण ही होगा और फिर शायद मुझे रजत या कांस्य ही मिल जाए। लेकिन मैं पूरे देश की मेरे लिये दिये गये समर्थन की आभारी हूं।


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