Login to your account

Username *
Password *
Remember Me

Create an account

Fields marked with an asterisk (*) are required.
Name *
Username *
Password *
Verify password *
Email *
Verify email *
Captcha *
Reload Captcha

आत्मनिर्भरता और कुपोषण साथ-साथ क्यों?

संयुक्त राष्ट्र संघ की एक विस्तृत रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत ने गरीबी को घटाकर आधा करके और लैंगिक समानता हासिल करने सहित सहस्त्रादि विकास लक्ष्यों की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है लेकिन भारत के लिए अभी कई चुनौतियां शेष हैं। चुनौतियां क्या हैं, इस पर भी रिपोर्ट में प्रकाश डाला गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत जहां भुखमरी खत्म करने के लक्ष्य हासिल करने की राह पर है, वहीं विश्व की एक तिहाई कुपोषित आबादी और विश्व में औसत से कम वजन के कम से कम एक तिहाई बच्चे भारत में रहते हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत में विश्व के करीब एक तिहाई खाद्य असुरक्षित लोग भी है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने गत 6 जुलाई को सहस्त्रादि विकास लक्ष्यों पर रिपोर्ट जारी की है। एशिया प्रशांत के लिए संयुक्त राष्ट्र आर्थिक एवं सामाजिक संचार रिपोर्ट जारी करता है। यूएनएएस सीएपी के अध्यक्ष नागेश कुमार के साथ देश के जाने माने अर्थ शास्त्री और नीति आयोग (पुराना योजना आयोग) के सदस्य विवेक देव राय ने भारत में सात जुलाई को रिपोर्ट जारी करते हुए कहा कि भारत में जहां लैंगिक समानता की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं, वहीं साक्षरता दर में महिलाएं पुरूषों से बहुत पीछे हैं। इसका मतलब है कि शैक्षिक व्यवस्था महिलाओं के अनुकूल अभी नहीं हो पायी है। सबसे ज्यादा चिंता बच्चों के वजन और कुपोषण को लेकर है। देश में खाद्यान्न आत्म निर्भरता है, फिर भी बच्चे कुपोषण का शिकार हो रहे हैं। केन्द्रीय खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्री राम विलास पासवान इसे जमाखोरी और काला बाजारी से जोड़ते हैं। हालांकि आंकड़ों की बाजीगरी भी किसी से छिपी नहीं हैं, इसलिए इस रिपोर्ट पर इतराने की जरूरत नहीं बल्कि वास्तविकता को देखकर उनका सामना करने की आवश्यकता है। मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स (एमडीजी) दुनिया का एक आईना होता है।
भारत ने विश्व मंच पर अपना विशिष्ट स्थान बनाया है, इसमें कोई संदेह नहीं है। आज हम परमाणु शक्ति सम्पन्न है और अंतरिक्ष में भी हमारी अच्छी दखल है। हमारे वैज्ञानिकों नें दुनिया के अन्य वैज्ञानिकों की अपेक्षा बेहतर क्षमता भी दिखती है। मंगलयान को पहली बार ही सफलता पूर्वक पहुंचा कर हमारे वैज्ञानिकों ने यह साबित भी कर दिया है। खाद्यान्न के मामले में हमारा देश आत्मनिर्भर है और बेहतर प्रबंधन कर सकें तो अनाज को बरबादी से बचाकर उसका निर्यात भी कर सकते हैं।
खराब मौसम के चलते गेहूं की फसल बर्बाद हुई लेकिन केन्द्रीय आपूर्ति मंत्री रामविलास पासवान के अनुसार देश के पास खाद्यान्न का पर्याप्त भंडार है। अनाज और दालों की कीमतों में वृद्धि हो रही है तो इसका कारण जमा खोरी है। श्री पासवान कहते हंै कि जमाखोरी और कालाबाजारी करने वाले मांग-आपूर्ति के अंतर को देखते को देखते हुए फायदा उठाने के लिये सक्रिय हो जाते हैं। केन्द्र ने राज्य सरकारों से कहा है कि वे जमाखोरों के साथ सख्ती बरतें और उन संवेदनशील स्थानों पर आपूर्ति बढ़ाएं जहां अक्सर कमी होती है। इस मामले में श्री पासवान ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून का भी जिक्र किया। पूर्ववर्ती यूपीए सरकार के कार्यकाल में श्रीमती सोनिया गांधी की पहल पर यह कानून लागू किया गया था। विपक्षी दल इसमें भी राजनीति देख रहे थे और इस कानून का विरोध करते थे। कांग्रेस शासित राज्यों ने ही इसे सबसे पहले लागू किया गया था। भाजपा भी इसका विरोध करती थी लेकिन मोदी की सरकार ने इसे बरकरार रखा। श्री पासवान ने कहा है कि सितम्बर तक यदि इस कानून को राज्यों ने लागू नहीं किया तो राशन की दुकानों के लिए अतिरिक्त अनाज का आवंटन बंद कर दिया जाएगा। इस योजना को अब तक 24 राज्यों ने लागू नहीं किया है। संसद में 2013 में पारित इस कानून को लागू करने की समय सीमा चार सितम्बर 2015 कर दी गयी है।
उल्लेखनीय है कि इस कानून के तहत देश की दो तिहाई आबादी को प्रतिमाह प्रति व्यक्ति एक से तीन रूपये प्रति किलो के दाम पर पांच किलो सब्सिडी युक्त अनाज प्राप्त करने का कानूनी अधिकार है। इस के तहत परिवारों की पहचान, राशन कार्ड जारी करना और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत करना शामिल है। ये सभी कार्य राज्य सरकारों को ही करना है। देश के सामने असली चुनौतियां यही हैं। संयुक्त राष्ट्रसंघ के पास जो आंकड़े पहुंचे हैं, इसीलिए उन पर भी संदेह होता है। गरीबी आधी हो गयी है। इसकी व्याख्या करना भी आसान नहीं है। पिछली यूपीए सरकार के समय शहरी और ग्रामीण गरीबों का मापदण्ड तय किया गया था। योजना आयोग ने जो आमदनी बतायी थी, उसका लोग मजाक उड़ा रहे थे। महंगाई जिस कदर बढ़ रही है, इसमें चाय की कीमत भी छह रूपयें हो गयी है। वर्तमान में दालें 100 रूपये किलो पहुंच गयी है। हरी सब्जियों की कीमत भी आसमान छू रही है। दूध पचास रूपये किलो बिक रहा है, और उसमें भी सिंथेटिक दूध की पहचान करना मुश्किल है। दूध का जितना उत्पादन नहीं होता, उससे ज्यादा पनीर की खपत हो रही है। दाल, सब्जी और दूध यदि उचित मात्रा में बच्चों को नहीं मिलेगा तो उनमें कुपोषण की समस्या पैदा होना स्वाभाविक है। और वजन भी मानक के अनुरूप नहीं होगा। केन्द्रीय आपूर्ति मंत्री राम विलास पासवान का यह कहना भी काफी हद तक उचित है कि जमाखोरों के चलते खाद्यान्न यहां तक कि प्याज आदि की कीमतें बढ़ रही हैं और गरीबों को अपने बच्चों का पेट भरना ही मुश्किल हो जाता है। इसके साथ ही भंडारण की भी उचित व्यवस्था करनी पड़ेगी। सब्जियों फलों का उत्पादन एक साथ प्रचुर मात्रा में होता है। और उनको सुरक्षित न रख पाने पर वे बर्बाद हो जाते है।
खाद्य सुरक्षा कानून का सभी राज्यों में लागू न होना निश्चित रूप से शर्मनाक है और 4 सितम्बर 2015 से इसे आगे नहीं बढ़ाना चाहिए। राज्यों को गरीबों की चिंता नहीं है अथवा उनकी नौकर शाही कोताही बरत रही है क्योंकि केन्द्र से अनाज का आवंटन तभी होगा जब राज्य यह बताएंगे कि कितने परिवार इसके पात्र है। राज्यों ने बीपीएल कार्ड और मनरेगा जाॅब कार्ड बनाने में जब ईमानदारी नहीं बरती तो खाद्य सुरक्षा कानून के तहत कार्ड भी मनमाने तरीके से ही बनेंगे।


0
0
0
s2smodern
  1. Popular
  2. Trending